ankahi
Wednesday, 13 November 2019
कभी भी भस्म नही हुई यादें सुलगती रही ताउम्र गीली लकड़ी की तरह
कड़वा सा कसैला धुआँ
दम घुटाता रहा उड़ा नहीं आसपास मंडराता रहा।
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